Thursday, 15 March 2018

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सफलता की कहानी

विद्याधन सभी धनों में श्रेष्ठ

इंदौर में स्वान्त: सुखाय विद्यादान जारी

इंदौर 15 मार्च, 2018

                शिक्षा मानसिक समस्या का मानसिक उपचार हैं। शिक्षा केवल ज्ञान का तीसरा नेत्र हैं बल्कि सौ तालों की एक चाबी हैं और  यह परमार्थ का सोपान हैं। यदि समाज में सभी शिक्षित हो जायें और सबको रोजगार मिल जायें तो समाज में 99 प्रतिशत अपराध कम हो जायेगें। इसीलिए भारतीय संस्कृति में ""सर्वे भवन्तु सुखिन:'' और "" वसुधैव कुटुम्वकम्'' की कामना की गयी हैं। इसी बात को ध्यान में रखकर कमिश्नर इंदौर संभाग श्री संजय दुबे द्वारा इंदौर संभाग में ""विद्यादान योजना'' लागू की हैं। इस भारत सरकार ने विद्यांजलि और मध्यप्रदेश शासन आओ मिल बांचे नाम से लागू किया है। इस अभियान से भूतपूर्व अधिकारी और शिक्षक तथा विद्यार्थी जुड़े हैं।

                विद्यादान कार्यकर्ता आत्म-सन्तुष्टि और सम्मान के लिए विद्यादान कर रहें हैं। शासकीय, प्राथमिक माध्यमिक स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता के सुधार के लिए विद्यादान योजना लागू की गई हैं। इस योजना के तहत विद्यादान कार्यकर्ता अधिकाधिक पंजीयन कीर रहे हैं तथा शिक्षा की गुणवत्ता बेहतर बनाने में अपना अमूल्य योगदान दे रहे हैं। विद्यादान योजना में गरीब बच्चों को पढ़ाने के लिए हैं। यह एक नि:शुल्क समाजसेवी कार्य है, और यह योजना पूरी तरह पेपरलेस है। कार्यकर्ताओं को 50 घंटे पढ़ाने के बाद ऑनलाइन प्रमाण-पत्र जारी जा रहा हैं। इस योजना के तहत इंदौर जिले में पिछले 3 साल में 2500 से अधिक कार्यकर्ताओं ने अपनी सेवाएं दी हैं। इस योजना के तहत 555 कार्यकर्ताओं ने इस शिक्षा सत्र के लिए पंजीयन करा लिया हैं।

                विद्यादान योजनान्तर्गत शासकीय प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में अपनी रुचि अनुसार सप्ताह में सिर्फ दो घंटे पढ़ाना है। समय, विषय और स्कूल कार्यकर्ताओं को स्वयं तय करना है। वैसे तो सभी विषय महत्वपूर्ण हैं, मगर गणित, अंग्रेजी और हिन्दी पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। शासकीय स्कूलों में मूलभूत सुविधाओं के मामले में निश्चित रूप से समस्याएं हो सकती हैं। सभी कार्यकर्ता काम करने के लिये तत्पर हैं और उन्होंने जो विद्यार्थी जीवन में समाज से हासिल किया है, अब उन्हें वापस करने का समय गया है। कार्यकर्ता अपने सामाजिक दायित्व से बच नहीं सकते। कार्यकर्ताओं की सुविधा अनुसार स्कूल के समय में परिवर्तन नहीं किया गया। कार्यकर्ता जिस समय अध्यापन करेंगे, उस समय संबंधित स्कूल के शिक्षक भी उपस्थित रहते हैं। स्कूल में पाठ¬क्रम पूरा करना संबंधित शिक्षक का दायित्व होगा। विद्यादान योजना से शैक्षणिक स्तर कितना ऊंचा हुआ, यह मूल्यांकन करना संबधित स्कूल के हेड मास्टर को दायित्व सौंपा गया हैं।

                शिक्षक स्वयं सदैव विद्यार्थी होता है। विद्यादान योजना से कार्यकर्ताओं को प्रतिदिन कुछ न कुछ नया सीखने को मिल रहा हैं। विद्याधन एक ऐसा धन है, जो खर्च करने पर सदैव बढ़ता जाता है। शासकीय स्कूलों में भवन, फर्नीचर, किताब आदि की भी समस्याएं हो सकती हैं। समाज के सबसे

गरीब वर्ग के लोग शासकीय स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाते हैं। कोई भी विद्यादान कार्यकर्ता अपने दो घंटे के अध्यापन काल में प्रथम पन्द्रह मिनट पिछले पुनस्र्मरण पर उसके बाद एक घंटे विषय अध्यापन पर और अंतिम 45 मिनट उसी दिन पढ़ाये गये विषय का पुनस्र्मरण करा रहें हैं। एक समय, एक दिन में उसी स्कूल में सिर्फ एक विद्यादान कार्यकर्ता ही अध्यापन कार्य करने की अनुमति दी गई है।

                वाट्सअप, फेसबुक और ट्विटर के विद्यादान कार्यकर्ता अपने फोटो और विचार भी वाट्सअप, फेसबुक और www.vidhyadaan.com पर शेयर कर रहें हैं। कोई भी व्यक्ति जो पढ़ाने के लिये इच्छुक है, वह इस विद्यादान वेबसाइट पर अपना रजिस्ट्रेशन घर बैठे कर सकता है।

शिक्षा जीवन का प्रकाश स्तम्भ

                हर युग में शिक्षा के महत्व को स्वीकार किया गया है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति भी अब्राहम लिंकन ने कहा है कि हमे अपने को मतदाता शिक्षित करना चाहिये। पूरे दुनिया मे जितने निरक्षर है, लगभग उतने निरक्षक भारत में हैं।  इस निरक्षता के कलंक हमें मिलजुलकर मिटाना हैं। आचार्य चाणक्य ने कहा है कि शिक्षा हमारे जीवन में प्रकाश स्तम्भ के समान है। शिक्षा संस्कार का आधार है। ज्ञानी, संत , समाज सुधारक कबीरदास ने कहा है कि मूर्ख  अस्त्र-शस्त्र से दुश्मन को मारते है मगर ज्ञानी व्यक्ति दुश्मन को ऐसा मारता है उसके रोम-रोम में घाव हो जाता है।

                यूनान के  दार्शनिक  प्लेटो ने शासक और शासित (जनता) दोनों के लिये शिक्षा अनिवार्य बताया है। उसने कहा कि किसी देश में बुराइयों को समाप्त करने के लिये शिक्षा जरूरी है। ज्ञान आभूषण सम्पत्ति है। शिक्षा के बिना समाज अन्धकारमय है। उसने कहा - ""विद्या दान के लिये, धन दान के लिये और शक्ति निर्बल की रक्षा के लिये है।'' राजा-महाराजा भी अपने बच्चों जगल में गुरूकुल में भेंजा करते थे। शिक्षा विवेक अर्जित करने का माध्यम है। विवेक शिक्षा का सार है। विवेक के बिना जीवन अधूरा है। विवेक जीवन संग्राम का साथी है।

विश्व प्रसिद्ध शिक्षा शास्त्री आचार्य चाणक्य ने लिखा हैं:-

" चौरहार्यं, राजहार्यं

भातृभाज्यं, भारिकारि।

व्यये कृते वर्धत एव नित्यम्।

विद्याधनं सर्वधनं प्रधानं।।''

(अर्थात् -विद्याधन को कोई चुरा नहीं सकता, राजा इसको राजसात नहीं कर सकता, भाइयों को बटवारे में इसका विभाजन नहीं हो सकता। विद्याधन वजनदार भी नहीं होता हैं। विद्याधन व्यय करने से बढ़ता हैं। इसलिये विद्याधन सभी धनों में श्रेष्ठ कहा गया हैं।)

प्रमाण पत्र- यह मेरी भौतिक, अप्रकाशित अप्रसारित रचना हैं। कृपया इसे प्रकाशित कर अनुग्रहीत करें।

(डॉ. बृजनाथ सिंह)

. जनसंपर्क

अधिकारी, संभागीय

जनसंपर्क कार्यालय, इंदौर

मो. नं. 9425781736

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